हर एक बात – मिर्ज़ा ग़ालिब – महफिले-ऐ-ग़ज़ल

Har EK Bat

हर एक बात – ग़ालिब

 हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है
तुम्हीं बताओ ये अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है

जला है जिस्म यहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ
दो-चार ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है

बना है साहिब का मुसाहिब फिरता है इतराता
वरना शहर में “ग़ालिब” की आबरू क्या है

Har Ek Bat – Ghalib

Har Ek Bat Pe Kehte Ho Tum Ki Tu Kya Hai
Tumhi Kho Ki Yeah Andaz-E-Guftgu Kya Hai

Ragon Mein Daudte Firne Ke Hum Nahi Kayal
Jab Ankh Se Hi Na Tapka To Phir Lahu Kya Hai

Jala Hai Jism Yahan Dil Bhi Jal Gaya Hoga
Kuredte Ho Jo Ab Rakh Jusjtu Kya Hai

Piyoon Sharaab Agar Khum Bhi Dekh Loon
Do Chaar Ye Sheesha-O-Qadah-O-Kooza-O-Suboo Kya Hai

Bna Hai Sahib Ka Musahib Phirta Hai Itraata
Warna Shehar Mein “Ghalib” Ki Abbru Kya Hai

1 thought on “हर एक बात – मिर्ज़ा ग़ालिब – महफिले-ऐ-ग़ज़ल

  1. रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
    जब आँख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है

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