हम कभी मिल सकें मगर – फ़राज़ की शायरी

 

हम कभी मिल सकें मगर – फ़राज़ की शायरी

 

हम कभी मिल सकें मगर , शायद
जिनके हम मुन्तज़र रहे, उनको मिल गए और हमसफ़र शायद

जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त , गौर कर शायद, अजनबीयत की धुंध छट जाए
चमक उठे तेरी नज़र शायद

ज़िन्दगी भर लहू रुलाएगी
याद -ऐ -यारां -ऐ -बेखबर शायद

जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं ‘फ़राज़
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद ..!!!​

उर्दू  और   हिंदी  शायरी  – फ़राज़ की शायरी – हम कभी मिल सकें मगर , शायद

 

Hum Kabhi Mil SakeiN Magar, Shayad
Jinke Hum Muntazar Rahe , Unko Mil gaye Aur Humsafar Shayad

Jaan Pahchaan Se Bhi Kya Hoga
Phir Bhi Ae Dost, Gauur Kar Shayad, Ajnabeeyat ki Dhund Chhat Jaye
Chamak Utthe Teri Nazar Shayad

Zindagi Bhar Lahu Rulaayegi
Yaad-e-Yaaran-e-Bekhabar Shayad

Jo Bhi BichhRe Wo Kab Mile haiN ‘FARAZ
Phir Bhi Tu Intezaar kar Shayad..!!!​

 

Hindi and urdu Shayari – Faraz ki Shayari – Gham-ae-Hayaat Ka Jhagra Mita Raha Hai Koi

 

Originally posted 2017-07-07 00:00:02.

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