संत कबीर अनमोल वाणी – कबीर के दोहे

Kabir Ke Dohe

संत कबीर वाणी

कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर
न कहु से दोस्ती न कहु से बैर

—-

बुरा जो देखन में चला , बुरा न मिलया कोई ,
जो मन खोजा अपना तो मुझ से बुरा न कोई

—-

चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोए
दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोई

—-

कल करे सो आज कर , आज करे सो अब
पल में परलय होगी , बहुरि करोगे कब

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संत कबीर दास के साधु बचन

साईं इतना दीजिये जिसमे  कुटुम्ब समाए ,
मैं भी भूखा न रहूँ , साधु भी न भूखा जाए

—-

दुःख में सिमरन सब करें , सुख में करे न कोई
जो सुख में सिमरन करे , तो दुःख कहे को होये .

—-

ऐसी वाणी बोलिये , मन का आपा खोये ,
अपना तन शीतल करे , औरों को सुख होये .

—-

धीरे धीरे रे मन धीरे सब कुछ होये ,
माली सींचे सौ घड़ा , ऋतू आये फल होये .

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दोहे संत कबीर के

जाती न पूछो साधु की , पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का पड़ी रहें जो मयान .

—-

जीवत समझे जीवत बुझाय , जीवत ही करो आस ,
जीवत करम की फाँस न काटी , मोये मुक्ति की आस

—-

माँगन मरन समान है , मत कोई मांगे भीख
माँगन से मरना भला यह सत गुरु की सीख

—-

कबीर मन निर्मल भय जैसे गंगा नीर
पाछे पाछे हर फिरे कहत कबीर कबीर .

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माया मरी न मन मरा

माया मरी न मन मरा , मर मर गए शरीर
आशा तृष्णा न मरी , कह गए दास कबीर

अर्थात -: यहाँ संत कबीर कहते हैं की शरीर भले ख़त्म हो जाता है परन्तु इंसान की इच्छाएं नहीं मरती
और जिसकी वजह से वो कभी भी ईश्वर को नहीं पा सकता .यहाँ वो इसी बात पर ज़ोर दे रहे हैं की हमे अपने मन को नियंत्रित रखना चाहिए व इस विनाश कालीन संसार की अपेक्षा अविनाशी परमात्मा में विश्वाश रखना चाहिए .

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तेरा साईं तुझ में है

जैसे तिल में तेल है , ज्यों चकमक में आग
तेरा साईं तुझ में है , तू जाग सके तो जाग

अर्थात-: यहाँ संत कबीर कहते हैं की शरीर को ही अपना मान लेने से व्यक्ति को दुःख मिलते हैं क्यूंकि ये नाशवान है परन्तु इसी के अंदर जीवात्मा जो परमात्मा का अंश भी है .इसलिए जैसे तिल में तेल होता है उसी तरह साधक को चाहिए की वो अपने स्वरुप अथार्त आत्मा में इस्थित होके स्वयं ही स्वयं को प्राप्त कर ले .

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जग में बैरी कोई नहीं

जग में बैरी कोई नहीं ,जो मन शीतल होय
या आपा को दारि दे ,दया करे सब कोई

अर्थात-: यहाँ संत कबीर कहते हैं की यदि तेरे मन के अंदर शीतलता है तो संसार में तेरा कोई वैरी नहीं है ,इसलिए इस अहंकार को त्याग दो फिर देखना सब तुम्हारे ऊपर दया रुपी अमृत की बरसात करने लगेंगे .

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पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भयो न कोई ,
ढाई अक्षर प्रेम के जो पढ़े सो पंडित होये

अर्थात-: यहाँ संत कबीर कहते हैं की हमे मन वचन और कर्म से भी किसी का अहित नहीं करना चाहिए तभी हम सच्चे अर्थों में ज्ञानी हैं ,उन्होंने एक और बात पर इशारा किया है की हमे अच्छी बातों को सुनने के साथ उन पर अमल भी करना चाहिए और वाणी से अपनाएं और भाईचारा फैलाना चाहिए न की औरों को कष्ट पहुँचाना .

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जैसे पेड़ खजूर

बड़ा हुआ तो क्या हुआ , जैसे पेड़ खजूर
पन्थी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर

अर्थात-: यहाँ संत कबीर कहते हैं की हमारी पढाई लिखाई ,उन्नति ,सम्पन्नता के असली मानक हमारी विनम्रता , दयालुता औरों के प्रति सदभाव है .जैसे की कोई ऊंचा पेड़ होने पर अगर मुसाफिर उसे छाँव नहीं पाते तो उसकी ऊंचाई निरर्थक है .

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