शायरी जो दिल में उतर जाये – लफ़्ज़ों की दास्ताँ

 

न किया कर अपने दर्द-ऐ-दिल को शायरी में बयान “मोहसिन”
लोग और टूट जाते हैं हर लफ़ज़ को अपनी दास्ताँ समझ कर

 

तुम नहीं , गम नहीं , शराब नहीं

तुम नहीं , गम नहीं , शराब नहीं
ऐसी तन्हाई का जवाब नहीं

कभी कभी इसे पढ़ा कीजिये
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं

जाने किस किस की मौत आई है
आज रुख पे उनके कोई नक़ाब नहीं

वो कर्म उँगलियों पे गिनते हैं
ज़ुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं

शायर – सईद राही

लफ़्ज़ों की दास्ताँ शायरी – Urdu Shayari in Hindi – तुम नहीं , गम नहीं , शराब नहीं
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खत लिख रहा हूँ

खत लिख रहा हूँ अहदमोहब्बत को तोड़ के
काग़ज़ पे आंसुओं के थपेड़े छोड़ छोड़ के

तू फ़िक्र मंद क्यों है मेरा दिल तोड़ के
मैं खुद ही जा रहा हूँ तेरा शहर छोड़ के ..

कल रात लिखने बैठा ग़ज़ल तेरे नाम की
अल्फाज़ सामने थे खड़े यूँ हाथ जोड़ जोड़ के

जिसमें तुम्हारा अक्स _ऐ _हसीं देखता था मैं
तुमने तो रख दिया वही आइना तोड़ के

ये दास्ताँ _ऐ _ज़ीस्त भी कितनी तवील है
रखने पड़े हैं मुझ को कुछ वरक मोड मोड के .

लफ़्ज़ों की दास्ताँ शायरी – Urdu Shayari in Hindi – खत लिख रहा हूँ अहद_ऐ_मोहब्बत को तोड़ के
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जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा
दीवारों से सर टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

हर बात गवारा कर लोगे मन्नत भी उतारा कर लोगे
ताबीजें भी बँधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

तन्हाई के झूले खुलेंगे हर बात पुरानी भूलेंगे
आईने से तुम घबराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

जब सूरज भी खो जाएगा और चाँद कहीं सो जाएगा
तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

बेचैनी बढ़ जायेगी और याद किसी की आएगी
तुम मेरा नाम गुनगुनाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

शायर – सईद राही

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दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटाने वाले

दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटाने वाले
मैंने देखे हैं कई रंग बदलने वाले

तुमने चुप रहकर सितम और भी ढाया मुझ पर
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसाने वाले

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूँ
वो और होंगे तेरे बाजार में बिकने वाले

आखरी दौर पे सलाम-ऐ-दिल-ऐ-मुज़्तर ले लो
फिर ना लौटेंगे शब्-ऐ -हिजर पे रोने वाले

शायर – सईद राही

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जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ

जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ
वहीँ डूबा हुआ पाया गया हूँ

बला काफी न थी एक ज़िन्दगी की
दोबारा याद फ़रमाया गया हूँ

सुपुर्दे ख़ाक ही करना है मुझको
तो फिर काहे को नहलाया गया हूँ

अगरचे अब्र -ऐ -गौहरबार हूँ में
मगर आखों से बरसाया गया हूँ

“हाफीज़” एहले-जुबां कब मानते है
बड़े ज़ोरों से मनवाया गया हूँ

शायर – हफ़ीज़ जालंधरी

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अब मिलते नहीं दोनों के ख्यालात

अब तो मुमकिन ही नहीं उन से मुलाक़ात “वासी”
अब तो उरूज़ पे पहुंची है उस की ज़ात “वासी”

वही वादे हैं और रस्मों की ज़ंजीरें बाक़ी
कब बदलती हैं ज़माने की रिवायात “वासी”

एक वो दिन थे के एक दुसरे को सोचते थे हम
अब मिलते नहीं दोनों के ख्यालात “वासी”

शायर – वासी शाह

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तेरे दिल में जगह पाई है

सारी दुनिया मुझे कहती तेरा सदाई है
अब मेरा होश मैं आना तेरी रुस्वाई है
सारी दुनिया की निगाहों से गिरा है “मजरूह”
तब कहीं जा के तेरे दिल में जगह पाई है

शायर – मजरूह सुल्तानपुरी

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वादा करके निभाना भूल जाते है

वादा करके निभाना भूल जाते है
लगा कर आग बुझाना भूल जाते है
यह तो आदात सी हो गयी है उनकी
रुलाते तो है मगर मानना भूल जाते है

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महफिलें सजती है रोज़

महफिलें सजती है रोज़ , सजती रहेंगी
जाम होते नहीं सब पीने पिलाने वाले
आस्तीन में छुरिया लेके घुमते है सब
दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले

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