Mirza Ghalib – मिर्ज़ा ग़ालिब

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तू तो वो जालिम है

तू तो वो जालिम है जो दिल में रह कर भी मेरा न बन सका , ग़ालिब
और दिल वो काफिर, जो मुझ में रह कर भी तेरा हो गया

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हजारों ख्वाहिशें

हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान , लेकिन फिर भी कम निकले

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खुदा की कुदरत

वो आये घर में हमारे , खुदा की कुदरत है
कभी हम उन्हें कभी अपने घर को देखते है

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जहाँ खुदा नहीं है

पीने दे शराब मस्जिद में बैठ के , ग़ालिब
या वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं है

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यूं होता तो क्या होता

हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया, पर याद आती है
जो हर एक बात पे कहना की यूं होता तो क्या होता

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इश्क़ पर जोर नहीं

इश्क़ पर जोर नहीं , यह तो वो आतिश है,  ग़ालिब
के लगाये न लगे और बुझाए न बुझे

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आह को चाहिए एक उम्र

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुलफ के सर होने तक

हमने माना की तग़ाफ़ुल न करेंगे लेकिन
खाक हो जायगे हम तुम्हे खबर होने तक

आशिक़ी सब्र -तलब और तमना बेताब
दिल का  क्या रंग करू, खून-ऐ-जिगर होने तक

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