यारों की इनायत – ख्वाजा मीर दर्द की शायरी

यारों की इनायत

न कोई इलज़ाम , न कोई तंज़ , न कोई रुस्वाई मीर ,
दिन बहुत हो गए यारों ने कोई इनायत नहीं की

हिंदी और उर्दू शायरी – ख्वाजा मीर दर्द की शायरी – न कोई इलज़ाम

 

Yaron ki Inayat

Na koi ilzaam, Na koi tanz, Na koi ruswai Mir,
din bohat hogaye yaron ne koi inayat nahi ki

Hindi and urdu shayari – Khwaja Mir Dard ki Shayari – Na koi ilzaam, Na koi tanz, Na koi ruswai Mir
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ज़ोर आशिक़ मिज़ाज है कोई

जब मैंने आकर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा

जान से हो गया बदन खाली
जिस तरफ तूने आँख भर के देखा

उन लबों ने की न मसीहाई
हम ने सौ -सौ तरह से मर देखा

ज़ोर आशिक़ मिज़ाज है कोई
“दर्द ” को किसे -ऐ -मुख़्तसर देखा

ख्वाजा मीर दर्द

हिंदी और उर्दू शायरी – ख्वाजा मीर दर्द की शायरी – जब मैंने आकर इधर उधर देखा

 

Zor Ashiq Mizaj Hai koi

Jag main aakar idhar udhar dekha
tu hi aya nazar jidhar dekha

Jaan se ho gaye badan khali
jis taraf tune ankh bhar ke dekha

Un labon ne ki na masihai
ham ne sau -sau tarah se mar dekha

Zor ashiq mizaj hai koi
Dard” ko qisa-e-mukhtasar dekha

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